भारत किसके साथ..? जंग या साज़िश..? जनता क्यों परेशान..?
युद्ध का असर… महंगाई और अफरा-तफरी पर क्यों दिख रहा है..? देश भर में गैस और पेट्रोल की लाइन क्यों लग रही है..?
क्या यही “संतुलन नीति” है..? दुनिया की राजनीति में कीमत आखिर कौन चुका रहा है..?
अमेरिका के साथ ट्रेड डील में जल्दबाजी क्यों की गई..?
Epstein फाइल्स में किन-किन नामों का जिक्र है और क्यों..?
अमेरिका के राष्ट्रपती Donald Trump और कुछ अंतरराष्ट्रीय नेताओं को लेकर मीडिया में चर्चा और बहस क्यों हो रही है..?
मीडिया और विपक्ष बार-बार भारत की नीति पर सवाल क्यों उठा रहे हैं..?
जवाब जरूरी है… क्योंकि असर सीधे जनता पर पड़ रहा है।
भारत के प्रधानमंत्री Narendra Modi ने हाल ही में कहा: “लोग पूछते हैं भारत किसके साथ है… तो मेरा जवाब है — हम भारत के साथ हैं।”
साथ ही यह संकेत भी दिया गया कि आने वाले समय में दिक्कतें और चुनौतियाँ बढ़ सकती हैं, और जैसे कोरोना काल में देश ने मिलकर सामना किया, वैसे ही आगे भी करना होगा।
लेकिन यहीं से असली सवाल शुरू होता है क्या “भारत के साथ” होने का मतलब भारत की जनता के साथ होना भी है..?
जनता पर जिम्मेदारी या नेतृत्व की परीक्षा..? क्या यह संदेश जनता को तैयार करने की जिम्मेदार अपील है..?
या जिम्मेदारी का बोझ जनता पर डालने जैसा महसूस होता है..?
कोरोना काल में जनता ने सब सहा — लॉकडाउन, आर्थिक दबाव, अनिश्चितता…
लेकिन क्या हर बार यही मॉडल दोहराया जाएगा..?
नेतृत्व की असली भूमिका क्या होनी चाहिए..? एक प्रधानमंत्री सिर्फ बयान देने वाला नहीं होता —
वह संकट प्रबंधन और नीति का केंद्र होता है।
इसलिए सवाल उठते हैं: क्या सरकार ने पहले से संकट की तैयारी की थी..? क्या ऊर्जा (तेल-गैस) के वैकल्पिक स्रोत सुनिश्चित किए गए..? क्या महंगाई नियंत्रण के ठोस कदम दिख रहे हैं..? क्या जनता को राहत देने के उपाय जमीन पर नजर आ रहे हैं..?
सिर्फ अपील नहीं — परिणाम दिखना जरूरी है भारत की नीति — इतिहास क्या कहता है? भारत का इतिहास बताता है कि देश ने हमेशा: संतुलित विदेश नीति अपनाई गुटनिरपेक्ष सोच रखी “राष्ट्रीय हित पहले” का रास्ता चुना आज सवाल यह है: क्या भारत उसी मजबूत और स्वतंत्र नीति पर कायम है..? या वैश्विक दबावों में संतुलन बदल रहा है..?
आम जनता का सीधा सवाल आम आदमी के लिए मुद्दा सीधा है: पेट्रोल महंगा क्यों..? गैस महंगी क्यों..? रोजमर्रा का खर्च क्यों बढ़ रहा है..? उसे जियोपॉलिटिक्स नहीं — अपनी जिंदगी का संतुलन चाहिए।
आज दुनिया में Iran और Russia जैसे देश ऊर्जा के बड़े स्रोत हैं।
ऐसे में भारत की रणनीति क्या है..? क्या ऊर्जा सुरक्षा मजबूत है..? क्या संतुलन सभी पक्षों के साथ बना है..? क्या देश किसी एक पर निर्भर हो रहा है..?
देश चलाने में जनता का सहयोग जरूरी है.
लेकिन जनता को सुरक्षित रखना सरकार की पहली जिम्मेदारी है.
अगर हर बार जनता से ही सहने की उम्मीद हो —
तो सवाल उठना स्वाभाविक है।
आज भारत की जनता सिर्फ यह जानना चाहती है: क्या सरकार पूरी तैयारी में है..? क्या नीति स्पष्ट और मजबूत है..? क्या आम आदमी की तकलीफ कम होगी..?
क्योंकि अंत में — हर वैश्विक फैसले की कीमत आम नागरिक ही चुकाता है।
सवाल उठाना विरोध नहीं —
जागरूक नागरिक होने की पहचान है।
जंग जज़्बात से नहीं…
बल्कि समझदारी, तैयारी और जिम्मेदार नेतृत्व से जीती जाती है।
देश के सुप्रीम लीडर और बे गुनाह मासूम स्कूली बच्चों का नरसंहार कर…
पिछले 25 दिनों से चल रहा यह दिशाहीन युद्ध —क्या यह एपस्टीन गैंग के व्हाइट कॉलर आरोपियों का खेल है..?
युद्ध को रोका जा सकता है!
लेकिन क्या इसे जानबूझकर जारी रखा जा रहा है..?
जैसे हम बरबाद तो दुनिया भी बरबाद वाली सोच..!!
क्या एक देश को बरबाद कर अपनी बडी ताकत और अधिकारोंका इस्तेमाल करते हुए युद्ध को किसी भी हालत में रोकने नहीं दिया जा रहा..?
क्या यह जवाबदेही से बचने और
अपनी कर्तूतों पर पर्दा डालने की कोशिश तो नहीं है..?
सच तो एक दीन सामने आयेगा —
– RTI Voice | भारतीय माहिती अधिकार
“सवाल पूछना लोकतंत्र की ताकत है।”